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भारत में धार्मिक संघर्ष

Irrelevant Religious Issue Hindi

प्रत्येक समाज व धर्म में कई तरह के अप्रासंगिक ज्वलंत बिंदु मौजूद है, जिन पर बेवजह अनवरत् बहस होती चली आ रही है और निष्कर्ष शून्य मिला है । आज हमें कोई तो ऐसी व्यवस्था समाज में स्थापित करना चाहिए जिससे भविष्य के लिए ये सभी प्रश्न खत्म हो और राष्ट्र में शांति का माहौल सदा बना रहें । वरना हम विरासत में अराजकता की सोच वाली पृष्ठभूमि ही छोड़ेंगे, क्या ये सही होगा? इसलिए आज का प्रश्न बनता है कि,

प्रश्न 9: क्या प्रत्येक समाज व धर्म को अपने-अपने ज्वलंत बिंदुओं का पुर्नःमूल्यांकन करना चाहिए?

प्रश्न से सहमत है तो क्या बदलाव होने चाहिए ? असहमत है तो क्यों ?

सोचो और राष्ट्र व समाज में परिवर्तन के लिये अपनी जीवंत राय माननीय महानुभावों को लिखें या “सहमत या असहमत” के बटन को दबाकर अपना मत प्रकट करें ।

आशयः

यह सर्वविदित है कि, प्रत्येक समाज में ज्वलंत बिंदु उभरे हुए हैं । क्यों ना उन सभी अप्रासंगिक ज्वलंत बिंदुओं पर प्रत्येक समाज के विशेषज्ञों की अपनी-अपनी समिति बनें । उनके द्वारा अपने समाज के सभी ज्वलंत बिंदुओं पर चर्चा व पुर्नःमूल्यांकन हो । उक्त समिति द्वारा मान्य सभी ज्वलंत बिंदुओं को लिखित में स्पष्ट करें और वे मान्यता प्रदान करें । संसद इन सभी मान्यताओं को संवैधानिक दर्जा देकर देश में स्थापित करें । संभवतः इस व्यवस्था को अपनाने से राष्ट्र को कई अप्रासंगिक कुप्रथा व नियमों से मुक्ती मिलेगी और आने वाली पीढ़िओं को लिखित दस्तावेज प्राप्त होने से उन्हें उचित मागदर्शन उपलब्ध रहेगा और हमारा राष्ट्र सदैव सर्वधर्म परम्परा को अपनाने वाला बना रहेगा ।

  1. क्या आज के शिक्षत समाज से भविष्य को यह अपेक्षा नहीं होगी कि वे अपने पूर्वजों की तरह ही अपने बदले सामाजिक स्वरूप और वास्तविकता के अनुभवों को लिखकर व् बदलकर दें?
  2. क्या हमें अपने युग के सामाजिक ज्वलंत प्रश्न पर ध्यान केंद्रित कर उसका समाधान करते हुए समाज व राष्ट्र के लिए उचित मार्गदर्शिका का लिखित में निर्माण नहीं करना चाहिए?
  3. क्या हमें अपनी आने वाली संतानों को सही सामाजिक व्यवस्था व समाज की कई अप्रासंगिक कुप्राथओं से मुक्ति का दस्तावेज उन्हें नहीं सौंपना चाहिए?
  4. क्या हमें आज के इस द्वैष भरें माहौल में अपने-अपने समाज के नियमों व कुप्रथाओं का पूर्नःमूल्यांकन आवश्यक महसूस नहीं हो रहा है?

उपरोक्त सभी प्रश्न परिर्वतन या बदलाव की मांग करते है । यह सत्य है कि जारी मान्यताओं से बदलाव की व्यवस्था को बिछोह होने में समय लगेगा । यह भी सत्य है कि प्रत्येक युग के सभी समाजों ने नई व्यवस्था व मान्यताओं को अपनाया है । आज के पल-पल बदलते परिवेश में हमें भी अपने राष्ट्र के भविष्य के लिए कोई ऐसा सूक्ष्म दस्तावेज बनाना चाहिए जो देश व समाज की उन्नति और प्रगति में सदैव सार्थक बना रहें ।

हम सभी सदैव “जय भारत” कहते हैं और चाहते है कि हमारा राष्ट्र हमेशा विजयी रहें । जय स्थाई तभी रह सकती है जब हम सही नेतृत्व प्रदान करें । जब हर युग अपने-अपने समय की महत्वता को लिखकर देगा तभी ही जय की परम्परा बनी रहेगी । हमारे युग की सर्वोच्च पुस्तक है “भारतीय संविधान” जो हमारा सर्वधर्म ग्रंथ है । हमारी वर्तमान सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था इससे ही संचालित हो रही है । इस पुस्तक में उल्लेखित समस्त वर्णन को हम सभी भारतीय सदैव अजर और अमर देखने की चाह रखते है । इसलिए अगर हम अपने समाज व धर्म से कुछ अप्रासंगिक ज्वलंत प्रश्नों पर चर्चा कर उन्हें पुर्नःमूल्यांकित करते हुए नवीन व्यवस्था स्थापित करते है तो भविष्य में वे सभी तथ्य मागर्दशक बने रहेंगे और सर्वधर्मता को स्थापित रखने में सहयोगी रहेंगे । इसलिए हमारे वर्तमान समाज व धर्म के ज्वलंत प्रश्नों का पुर्नःमूल्यांकन आवश्यक प्रतीत होता है ।

इस मंच के माध्यम से आप सभी जागरूक राष्ट्र भक्तों से अपील है कि वे राष्ट्र निर्माण व युग परिर्वतन के लिए अपने विचार जरूर प्रकट करें या राष्ट्र से सदैव ज्वलंत प्रश्न करते रहें । आपके उज्जवल विचार व ज्वलंत प्रश्न हमेशा संविधान निर्माताओं के लिए प्ररेणास्त्रोत बने रहें, इसी आशा के साथ….जय हिंद । जय भारत ।

पाठकों से निवेदन –

इस विषय पर आपका विचार या सुझाव परिवर्तन के लिए सार्थक हो सकता है । आप अपने विचार या सुझाव इस ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें या अपना मत दे । आपके विचार/सुझाव व प्रश्न सीधे देश के सर्वोत्तम पदों पर आसीन महानुभावों को प्रेषित हैं । आपके बहुमूल्य विचार/सुझाव पर हो सकता है सरकार अमल करते हुए कार्यान्वित करें । आप इसी उम्मीद के साथ अपने विचार रखें । धन्यवाद ।

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Atharva

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